घड़ा बड़ा है सीने में तेरी याद से भरता जाता है बाहर कभी दिखता नहीं बस आखों से छलकता है
साथ भी रखना चाहूँ मैं पर भार घड़े का ज्यादा है अँधेरे में, अकेले में ये मुझे डुबाये जाता है आजा माँ तू वापस आजा एक आखिरी बोल सुना दे इस मर्ज की दवा बता दे आकर मुझको गले लगा ले इस घड़े का वजन उठा ले नहीं उठाया जाता अब दर्द देता है ये घड़ा
Took me a year
to get over seven days with her
Then she returned...
...and left again
November 28, 2016
वो मुझसे दूर क्या गयी उसकी तासीर ही बदल गयी पहले बातों से दिल लुभाती थी अब यादों से सुइयाँ चुभाती है
मुलाकात से पहले ही जुदाई उसकी तक़दीर में थी तब खुशकिस्मत था कि अंजान नहीं अब बदकिस्मत हूँ कि पहचान है जब संग थी तो मुस्कान थी वो होठों पर अब संग नहीं, तो कलम की शायरी बन गयी
वो मुझसे दूर क्या गयी भावनाएँ उथल-पुथल कर गयी यहाँ थी तो चेतना का संचार था वहां है, तो बस वेदना ही वेदना है
November 8, 2016
हल्का सा एक झोंका, खुशबू ले के आया पंखुरियों के पीछे निकल पड़े हम वह झोंका आंधी में कब बदला पता नहीं पंखुरियाँ राख बन गयी घुटनों पर गिर गए हम